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Osho

Category Religion & Spirituality
Cover Type Paperback
Type Textbook
Language Hindi

ISBN 9789937758796

Rs. 440

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Osho

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Bhaj Govindam Mudhmate

Bhaj Govindam Mudhmate

By Osho

ब्रह्म-सूत्र, उपनिषद और गीता पर भाष्य लिखनेवाले आदिशंकराचार्य का भक्त हृदय उनके इन छोटे पदों में स्पष्ट झलकता है। इस प्रवचनमाला में ओशो ने वह भक्त हृदय अपनी वाणी द्वारा और भी अधिक मुखरित किया है। प्रवचनमाला में प्रश्नोत्तर भी समाविष्ट हैं। अनुक्रम #1: सदा गोविन्द को भजो #2: क्षणभंगुर का आकर्षण #3: सत्संग से निस्संगता #4: कदम कदम पर मंजिल #5: आशा का बंधन #6: तर्क का सम्यक प्रयोग #7: परम-गीत की एक कड़ी#8: संसार—एक पाठशाला #9: दुख का दर्पण #10: एक क्षण पर्याप्त है सत्य मिलता है शून्य में और खो जाता है शब्दों में। सत्य मिलता है मौन में, बिछुड़ जाता है मुखरता में। सत्य की कोई भाषा नहीं है। सारी भाषा असत्य है। भाषा मात्र मनुष्य का निर्माण है। सत्य मनुष्य का निर्माण नहीं, आविष्कार है। सत्य तो है ही, उसे बनाना नहीं है, न उसे प्रमाणित करना है, सिर्फ उघाड़ना है। और उघाड़ने की घटना, जब मनुष्य के भीतर सारी भाषा का ऊहापोह शांत हो जाता है, तभी घटती है। क्योंकि भाषा के ही परदे हैं, विचार से ही बाधा है। यह बहुत बुनियादी और प्राथमिक सूत्र है समझ लेने का। बच्चा पैदा होता है; कोई भाषा उसके पास नहीं होती। न कोई शास्त्र लेकर आता है, न कोई धर्म; न कोई जाति, न कोई राष्ट्र। उतरता है शून्य की भांति। शून्य की पवित्रता अनूठी है। शून्य एकमात्र कुंआरापन है, बाकी तो सभी विकृत है। उतरता है एक ताजे फूल की भांति। चेतना पर एक लकीर भी नहीं होती। जानता कुछ भी नहीं। लेकिन बच्चे की जानने की क्षमता शुद्ध होती है। दर्पण है; अभी कोई प्रतिबिंब भी नहीं बना। लेकिन दर्पण की क्षमता पूरी है, शुद्ध है। बाद में प्रतिबिंब तो बहुत बन जाएंगे, जानना तो बढ़ जाएगा, जानने की क्षमता कम होती जाएगी; क्योंकि वह जो शून्य था, वह शब्दों से भर जाएगा; उसकी रिक्तता समाप्त हो जाएगी। जैसे दर्पण पर प्रतिबिंब बनें और चिपकते चले जाएं, अलग न हों, तो दर्पण की झलकाने की क्षमता कम हो जाएगी। बच्चा पैदा होता है, जानता कुछ भी नहीं, लेकिन जानने की क्षमता उसकी परिशुद्ध होती है। इसीलिए तो बच्चे जल्दी सीख लेते हैं, बूढ़े मुश्किल से सीख पाते हैं; क्योंकि सीखने की क्षमता ही बूढ़े की कम हो गई--मन भर गया; स्लेट पर बहुत कुछ लिखा जा चुका; कागज अब कोरा नहीं है। पहले कागज को कोरा करना पड़े, तभी कुछ नया लिखा जा सके। बच्चा जैसा पैदा होता है, यदि तुम पुनः वैसे ही हो जाओ, तो ही सत्य को पा सकोगे। तो एक जन्म तो बच्चे का है और एक जन्म संतत्व का। जिसके जीवन में दूसरा जन्म घट गया, जो द्विज हो गया, वही ब्राह्मण है। —ओशो

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ISBN: 9789937758796

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Author Osho
ISBN 9789937758796
Cover Type Paperback
Type Textbook
Language Hindi
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